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legal summarization.

English to Hindi. Comparing zero-shot, few-shot, and chain-of-thought prompting against the Hindi reference on 10 samples from the MILDSum dataset using Qwen3.5-4B (Q4_K_M).

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Errors:HallucinationsOmissionsWrong FactsWrong LegalTranslationTerminology

HI Reference

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने मंगलवार को दिल्ली सरकार को एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी, जो साकेत न्यायालयों में एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश हैं, को पिछले साल उनके COVID-19 उपचार के लिए उनके द्वारा किए गए खर्चों की प्रतिपूर्ति के रूप में 16 लाख रुपये से अधिक का भुगतान करने का निर्देश दिया। एडीजे दिनेश कुमार को COVID-19 की दूसरी लहर के दौरान 22 अप्रैल से 7 जून, 2021 के बीच शहर के PSRI अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां वे तीन हफ्ते तक वेंटीलेटर पर रहे। जबकि उन्हें अस्पताल को 24,02,380 रुपये देने थे। सरकार ने केवल 7,08,500 रुपये की प्रतिपूर्ति इस आधार पर की कि अस्पताल ने COVID-19 से पीड़ित रोगियों के इलाज के लिए निर्धारित शुल्क की अनदेखी की है। जस्टिस रेखा पल्ली ने कहा कि निस्संदेह अधिकारियों का यह आग्रह करना उचित है कि अस्पताल ने जीएनसीटीडी द्वारा जारी परिपत्र दिनांक 20.06.2020 में निर्धारित राशि से अधिक फीस लिया था, और यह केवल उक्त अधिक फीस के कारण ही है कि याचिकाकर्ता को उसकी प्रतिपूर्ति की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ा। अदालत ने कहा, "तथ्य यह है कि अप्रैल और मई, 2021 के दौरान, जब दिल्ली के निवासी न केवल अस्पताल के बिस्तर पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, बल्कि ऑक्सीजन की भारी कमी भी थी, याचिकाकर्ता के पास प्रतिवादी के पास इलाज कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं था और शुक्र है कि वह बच गए। यह सोचकर डर लगता है कि याचिकाकर्ता का क्या हश्र होता अगर वह उस समय प्रतिवादी नंबर 5 अस्पताल में इलाज नहीं कराता।" याचिका को स्वीकार करते हुए, अदालत ने कहा कि न्यायाधीश, जिन्हें अपनी जान बचाने के लिए COVID-19 के इलाज के लिए अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करनी पड़ी, को आसानी से यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्हें अस्पताल से रिफंड मांगना चाहिए क्योंकि यह दिल्ली के नियमों का पालन करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा, "यह न्यायालय वर्तमान याचिका में दिनांक 20.06.2020 के सर्कुलर की वैधता में तल्लीन करना उचित या आवश्यक नहीं मानता है, जहां दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा का एक अधिकारी द्वारा किए गए वास्तविक खर्चों के लिए राशि की सरल प्रतिपूर्ति की मांग कर रहा है।" अदालत ने कहा कि जब शहर महामारी की दूसरी लहर से घिरा हुआ था, तब उसे कोविड-19 के लिए प्रतिवादी संख्या 5 अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया था। जस्टिस पल्ली ने हालांकि दिल्ली सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि अस्पताल को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह सर्कुलर में निर्धारित राशि से अधिक राशि चार्ज करने की अपनी कार्रवाई के बारे में अपना रुख स्पष्ट करे या उसे शेष राशि वापस करने का निर्देश दिया जाए। कमांडर रणदीप कुमार राणा बनाम भारत संघ मामले में उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि एक मामले की सुनवाई करते हुए एक खंडपीठ ने कहा है कि नियोक्ता सरकारी कर्मचारी को भुगतान करने के लिए बाध्य था, और अस्पताल से कानून के अनुसार उचित वसूली कर सकता था जिसने उसे ओवरचार्ज कर दिया था। अदालत ने कहा, "पूर्वोक्त के आलोक में, मुझे यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि प्रतिवादी संख्या 1 से 3 को याचिकाकर्ता को तुरंत 16,93,880/- रुपये का भुगतान करके प्रतिपूर्ति करनी चाहिए, और यदि अनुमति हो, तो उसे प्रतिवादी संख्या 5 से वसूल करना चाहिए। " जस्टिस पल्ली ने स्पष्ट किया कि अदालत ने सर्कुलर की वैधता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और कहा है कि अधिकारियों के पास अस्पताल के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने सहित कानूनी उपाय करने और अधिक वसूल की गई किसी भी राशि की वसूली" करने का अधिकार होगा। अदालत ने कहा, "रिट याचिका, तदनुसार, प्रतिवादी संख्या 1 से 3 को चार सप्ताह के भीतर 16,93,880/- रुपये की शेष राशि का भुगतान करने का निर्देश देकर अनुमति दी जाती है, जैसा कि प्रतिवादी संख्या 3 द्वारा जारी संचार दिनांक 02.05.2022 में उल्लेख किया गया है।" कुमार का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर वकील जे.पी. सेंघ ने पहले तर्क दिया कि सरकार के किसी भी पैनलबद्ध अस्पतालों में उनके इलाज के लिए अस्पताल के बिस्तर उपलब्ध नहीं थे और उनके ऑक्सीजन के स्तर में कमी के कारण उन्हें निकटतम अस्पताल ले जाना पड़ा। सेंघ ने प्रस्तुत किया, "याचिकाकर्ता, जो उस चरण में एक असहाय अवस्था में था, के पास 24,02,380 रुपये की पूरी राशि का भुगतान करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था, जैसा कि प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा उचित रसीदों के खिलाफ मांग की गई थी।" सेंघ ने तर्क दिया कि अधिकारियों द्वारा निर्धारित राशि से अधिक राशि वसूलने के लिए न्यायिक अधिकारी को दोष या दंडित नहीं किया जा सकता है। उन्होंने प्रस्तुत किया कि यदि संबंधित सर्कुलर का उल्लंघन किया गया है तो संबंधित अधिकारियों को अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरी ओर, दिल्ली सरकार ने कहा कि अस्पताल को यह बताने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए कि उसने दिल्ली सरकार के सर्कुलर का पालन क्यों नहीं किया। वकील अवनीश अहलावत ने कहा, "उक्त प्रतिवादी, जिसने 20.06.2020 के सर्कुलर में निर्धारित दरों से अधिक फीस लिया है, को याचिकाकर्ता से वसूल की गई अत्यधिक राशि वापस करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।"

Zero-shot

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज (02.05.2022) दिल्ली उच्च न्यायालय सेवा के एक कार्यकारी अधिकारी, जो सकेत कोर्ट में अतिरिक्त जिला न्यायमूर्ति के तौर पर कार्यरत हैं, की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि वे उन व्ययों का पूरा पुनर्प्राप्त (reimbursement) करें जो उन्हें 22 अप्रैल 2021 से 07 जून 2021 तक कोविड-19 के इलाज के लिए सकेत हॉस्पिटल में व्ययित करना पड़ा, जिसमें कुल 24 लाख 2 हजार 380 रुपये का भुगतान किया गया था। याचक ने तर्क दिया कि "एक बार यह स्वीकार कर लिया जाता है कि पूरा रासा 24,02,380/- कोविड-19 के इलाज के लिए व्ययित हुआ, जो मैंने ज़िंदगी की गंभीर खतरे के कारण सकेत हॉस्पिटल से लिया था, तो उसे पुनर्प्राप्ति का अधिकार है," और यह दावा किया गया कि यदि हॉस्पिटल ने नियमों का उल्लंघन किया, तो भी याचक को दोषी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने इस तथ्य पर जोर दिया कि "अप्रैल और मई 2021 के दौरान, जब दिल्ली के निवासी न केवल हॉस्पिटल बेड प्राप्त करने में संघर्ष कर रहे थे, बल्कि ऑक्सीजन की भारी कमी भी थी, याचक को कोई अन्य विकल्प नहीं था," और यह स्पष्ट किया कि "यह अधिकारी की कमाई हुई बचत खर्च करना पड़ा जब वह अपनी ज़िंदगी बचा रहा था, तो उसे सिर्फ इसलिए नहीं बताया जा सकता कि हॉस्पिटल ने नियमों का उल्लंघन किया।" अंततः, न्यायालय ने याचक को चार हफ्तों के भीतर शेष रासा 16 लाख 93 हजार 880 रुपये भुगतान करने का आदेश दिया और यह स्पष्ट किया कि यदि कानून अनुमति देता है, तो इस रासा को सकेत हॉस्पिटल से वापस ले लिया जा सकता है। **केस विवरण:** - **केस शीर्षक:** (शीर्षक का उद्धरण नहीं दिया गया, लेकिन संदर्भ के अनुसार यह एक व्रित याचिका (Writ Petition) थी) - **बेंच:** दिल्ली उच्च न्यायालय का डिवीजन बेंच (संदर्भ में 'Sqn. Commander Randeep Kumar Rana' के निर्णय को संदर्भित किया गया है, जो एक पूर्व निर्णय था) - **वाक्यालय:** याचक की ओर से सीनियर कानूनी सलाहकार (नाम नहीं दिया गया), और रिस्पॉन्डेंट 1-3 की ओर से मिस अहलावत (सीनियर कानूनी सलाहकार)।

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Few-shot

दिल्ली हाई कोर्ट ने आज ही एक याचिका को स्वीकार करते हुए दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के एक अधिकारी को कovid-19 उपचार के लिए खर्च किए गए पूरे राशि 24,02,380 रुपये में से प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा चार्ज किए गए अतिरिक्त 16,93,880 रुपये भी बहाल करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता, जो सकेत कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के रूप में कार्यरत थे, ने दलील दी कि उन्हें 22 अप्रैल से 7 जून 2021 तक दिल्ली नगर प्रशासन (एनसीटी) की रजिस्टर किए गए किसी भी अस्पताल में बिस्तर नहीं मिल पाया था और ऑक्सीजन स्तर गिरने के कारण उन्हें एयरटेकर पर तीन सप्ताह तक जबरदस्ती रखना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने 24 लाख रुपये का पूरा बिल चुका दिया। हालांकि, दिल्ली नगर प्रशासन द्वारा बनाए गए तकनीकी समिति की सिफारिशों के आधार पर उन्हें केवल 7,08,500 रुपये ही वापस मिले और शेष राशि को अस्वीकार किया गया क्योंकि अस्पताल ने 20 जून 2020 की सरकारी आदेश में निर्धारित दरों से अधिक चार्ज किया था। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, "एक बार यह स्थापित हो जाता है कि याचिकाकर्ता ने अपने जीवन की गंभीर खतरे को दूर करने के लिए मजबूरी में पूरा राशि खर्च किया, तो उसे पूरी राशि वापस मिलने का अधिकार है।" न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि "किसी भी नागरिक की जिम्मेदारी नहीं होती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सरकारी प्राधिकरण द्वारा निर्धारित दरों से अस्पताल अधिक चार्ज नहीं करता, और यदि अस्पताल ने पैकेज रेट से अधिक चार्ज किया है, तो न्यायिक अधिकारी को उस पर भुगतान करना ही होगा।" इस प्रकार, दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 1 से 3 के खिलाफ याचिका को स्वीकार कर लिया और उन्हें चार सप्ताह के भीतर शेष राशि 16,93,880 रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया। मामला: दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी बनाम दिल्ली नगर प्रशासन (प्रतिवादी संख्या 1-3)। पीठ: अज्ञात। अधिवक्ता: याचिकाकर्ता के लिए अनुभवी वकील, प्रतिवादी के लिए श्री अहलावत।

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CoT

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज (02.05.2022) दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के एक अधिकारी, जो सकेत कोर्ट में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-02 के तौर पर कार्यरत हैं, की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि यदि किसी सरकारी नौकरशाही अधिकारी को महामारी के दौरान जीवन बचाव हेतु निजी अस्पताल में इलाज कराया गया है और उसने उसकी खर्ची हुई पूरी राशि चुकाई है, तो उसे उस राशि का पूर्ण पुनःप्राप्ति (reimbursement) देना चाहिए, चाहे वह अस्पताल ने नियमों के विपरीत अधिक की गई दरें चार्ज की हों या न हो। याचिकाकर्ता ने यह दावा किया कि उन्हें 2021 के अप्रैल से जून तक दिल्ली में उपलब्ध नहीं होने वाले अस्पताल बेड और ऑक्सीजन की कमी के कारण, उन्हें सकेत कोर्ट के पास स्थित रеспॉन्डेंट नंबर-5 अस्पताल में वाइटर पर तीन हफ्ते तक इलाज कराया गया था। उन्होंने बताया कि वे अपने जीवन के गंभीर खतरे का सामना करते हुए पूरी राशि 24,02,380 रुपये चुकाए थे, जबकि रеспॉन्डेंट नंबर-1 से 3 ने सिर्फ 7,08,500 रुपये वापस किए हैं और बाकी 16,93,880 रुपये का पुनःप्राप्ति नहीं दिया है। याचिकाकर्ता ने कहा, "एक बार यह स्वीकार कर लिया जाए कि पूरी राशि 24,02,380/- मेरी चिकित्सा के लिए खर्च हुई थी और मैंने इसे रिसाव करने के लिए मजबूर होकर चुकाया था, तो मुझे उस पूरे राशि का पुनःप्राप्ति का अधिकार है।" दरअसल, याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि उन्हें किसी भी प्रकार की सजा या दंड नहीं देना चाहिए क्योंकि अस्पताल ने नियमों के विपरीत अधिक की गई दरें चार्ज की थीं और यदि अस्पताल ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो रिसाव करने वाले अधिकारियों को उस अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। इस मामले में, दिल्ली सरकार द्वारा जारी 20.06.2020 की सैक्युलर (circular) का उल्लंघन करने के कारण रिसाव नहीं किया जा सकता है, यह तर्क दिया गया था कि अस्पताल ने अधिक की गई दरें चार्ज की हैं और इसलिए अधिकारियों को उस राशि का पुनःप्राप्ति नहीं देना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय के बेंच ने इस बात पर विचार किया कि महामारी के दूसरे लहर के दौरान, जब दिल्ली के निवासी अस्पताल बेड और ऑक्सीजन की भारी कमी का सामना कर रहे थे, याचिकाकर्ता को कोई अन्य विकल्प नहीं था और उसने जीवन बचाकर जीवित रहने के लिए इलाज कराया। न्यायालय ने कहा कि "यह सोचना डराने वाला है कि यदि वह उस समय रिसाव करने वाले अस्पताल में इलाज नहीं करवाया होता, तो उसके क्या भला-बुरा हो जाता।" न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरशाही अधिकारी को अपनी कमाई की बचत खर्च करके जीवन बचाते समय यह नहीं कहा जा सकता है कि अस्पताल ने नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए उसे उस अस्पताल से रिसाव लेना चाहिए। अंत में, न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार किया कि यदि कोई सरकारी अधिकारी किसी निजी अस्पताल में इलाज के लिए मजबूर हो गया है और उसने उसकी खर्ची हुई पूरी राशि चुकाई है, तो उसे उस राशि का पूर्ण पुनःप्राप्ति देना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि "यदि अस्पताल ने पैकेज रेट से अधिक की गई दरें चार्ज की हैं, तो सरकारी अधिकारी को उन खर्चों के लिए जवाबदेह होना चाहिए जो वह पैकेज रेट से अधिक चुकाया है।" इस आधार पर, न्यायालय ने निर्णय दिया कि रिसाव करने वाले अधिकारियों (रеспॉन्डेंट नंबर-1 से 3) को तुरंत याचिकाकर्ता को उस अंतर राशि 16,93,880 रुपये का पुनःप्राप्ति देना चाहिए और यदि कानून में अनुमति है, तो उन्हें उसी राशि को रिसाव करने वाले अस्पताल (रеспॉन्डेंट नंबर-5) से वापस ले सकते हैं। संक्षेप में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि किसी सरकारी अधिकारी को महामारी के दौरान जीवन बचाव हेतु निजी अस्पताल में इलाज कराया गया है और उसने उसकी खर्ची हुई पूरी राशि चुकाई है, तो उसे उस राशि का पूर्ण पुनःप्राप्ति देना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि "सरकारी अधिकारी को अपनी कमाई की बचत खर्च करके जीवन बचाते समय यह नहीं कहा जा सकता है कि अस्पताल ने नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए उसे उस अस्पताल से रिसाव लेना चाहिए।" संदर्भ: 1. याचिकाकर्ता: दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-02 सकेत कोर्ट) 2. रिसाव करने वाले: रеспॉन्डेंट नंबर-1 से 3 (दिल्ली सरकार/उच्च न्यायिक सेवा आयोग) 3. अस्पताल: रеспॉन्डेंट नंबर-5 4. राशि: कुल खर्च 24,02,380 रुपये; वापस किया गया 7,08,500 रुपये; बाकी राशि 16,93,880 रुपये 5. तारीख: इलाज 22.04.2021 से 07.06.2021; निर्णय 02.05.2022 6. न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) 7. बेंच: डिवीजन बेंच (Division Bench) - नाम नहीं दिया गया है 8. वकील: याचिकाकर्ता के लिए सीनियर कौंसल; रिसाव करने वालों के लिए मिस अहलावात (Mrs. Ahlawat)

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